Positive News: दिल्ली के आर्टेमिस अस्पताल के डॉक्टरों ने कोविड-19 से संक्रमित 47 वर्षीय एक मरीज के फेफड़ों को बचाने के लिए एक दुर्लभ एलिमेंट का इस्तेमाल किया. गणित की प्रोफेसर कुमारी रंजना, फेफड़ों से रिसाव के कारण, छाती में, हृदय के आसपास और त्वचा के नीचे के टिशू में हवा की असामान्य उपस्थिति से जुड़ी कोविड जटिलता के सबसे खराब रूपों में से एक से पीड़ित थीं.Also Read - Covid-19 Delta Variant: जंगल की आग की तरह क्यों फैलता है डेल्टा कोविड वेरिएंट? जानें हर बात

फेफड़ों में सर्फेक्टेंट नामक एक दुर्लभ तत्व का उपयोग करके उसका इलाज किया गया था. Also Read - England vs India, 4th Test: टीम इंडिया पर Ravi Shastri के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने का पड़ा असर, Vikram Rathour का खुलासा

पीडियाट्रिक कार्डिएक सर्जरी आर्टेमिस अस्पताल के प्रमुख असीम रंजन श्रीवास्तव ने कहा, “हमने आर्टिफिशियली रोगी के फेफड़ों में पल्मोनरी सर्फेक्टेंट नामक एक एलिमेंट डाला. यह एलिमेंट स्वाभाविक रूप से फेफड़ों में मौजूद होता है, लेकिन कोविड के कारण विकृत या नष्ट हो जाता है, जिससे फेफड़े असामान्य रूप से काम करते हैं.” Also Read - Corona Update: देश में आज आए 38,948 नए केस, एक्‍ट‍िव मरीज 4 लाख 4 हजार से अधिक

रंजना को आईसीयू में भर्ती कराया गया था क्योंकि वह कोविड -19 निमोनिया और हवा के रिसाव वाले फेफड़ों के गंभीर मामले से पीड़ित पाई गई थीं.

मैकेनिकल वेंटिलेशन पर कोविड रोगियों के बचने की संभावना कम है, जिनके फेफड़े हवा का रिसाव कर रहे हैं.

आर्टेमिस के डॉक्टरों की टीम ने उसे एक्स्ट्राकॉर्पोरियल मेम्ब्रेन ऑक्सीजनेशन (ईसीएमओ) पर रखा, जो ओपन-हार्ट सर्जरी में इस्तेमाल होने वाले हार्ट-लंग बायपास मशीन के समान है. ईसीएमओ रोगी के खून को शरीर के बाहर पंप करता है और ऑक्सीजन देता है, जिससे हृदय और फेफड़ों को आराम मिलता है.

हालांकि, शुरू में ईसीएमओ से उत्साहजनक परिणाम मिलने के बाद हालात फिर से बिगड़ने लगे. इस मोड़ पर, डॉक्टरों ने फेफड़े का ट्रांसप्लांट करने पर भी विचार किया. लेकिन रंजना इस स्थिति में नहीं थी कि उसका ट्रांसप्लांट कर सकें.

डॉक्टरों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. खून बहने का जोखिम, संक्रमण की रोकथाम और फेफड़ों से हवा का लगातार रिसाव होना था.

फेफड़ों में पल्मोनरी सर्फेक्टेंट का उपयोग करने से रोगी की स्थिति में सुधार हुआ. रंजना को वेंटिलेटर पर वापस लाने से पहले एक महीने तक ईसीएमओ पर रहीं.

डॉक्टरों ने कहा कि रंजना को बात करने, बैठने, खाने और यहां तक कि किसी सहारे से चलने की ताकत हासिल करने में अस्पताल में 98 दिन लग गए.

रंजना ने कहा, “यह मेरे लिए दूसरे जन्म जैसा लग रहा है. मैंने सारी उम्मीद छोड़ दी थी.”
(एजेंसी से इनपुट)